Vivekananda Forum Meet Tursday 01 May 2025
Portion 01 of 03
Page 319 to 322 | परिच्छेद ४६ |
अन्तिम दर्शन | स्थान – बेलुड़ मठ | वर्ष – १९०२ ईसवी
विषय –
– जातीय आहार, पोशाक व आचार छोड़ना दोषास्पद है
– विद्या सभी से सीखी जा सकती है,
– परन्तु जिसके द्वारा जातीयता लुप्त हो जाती है, उसका हर तरह से परित्याग करना चाहिए – – पहिनाव के सम्वन्ध में शिष्य के साथ वार्तालाप
– स्वामीजी के पास शिष्य की ध्यान में एकाग्रताप्राप्ति की प्रार्थना स्वामीजी द्वारा शिष्य को आशीर्वाद – विदा।
………
एक प्रश्न पूछने में संकोच कर रहा था।
स्वामीजी –
क्या सोच रहा है? कह ही डाल ना। (मानो मन की बात ताड़ गये हो !)
शिष्य लज्जित भाव से कहने लगा,
“महाराज सोच रहा था कि यदि आप ऐसा कोई उपाय सिखा दें, जिससे मन बहुत जल्द स्थिर हो जाय, जिससे बहुत जल्द ध्यानमग्न हो सकूँ, तो बड़ा ही उपकार हो। संसार के चक्र में पड़कर साधनभजन के समय मन स्थिर करना बड़ा कठिन होता है।”
ऐसा मालूम हुआ कि शिष्य की उस प्रकार की दीनता को देख स्वामीजी बहुत ही प्रसन्न हुए।
उत्तर में वे स्नेहपूर्वक शिष्य से बोले,
“थोड़ी देर बाद जब ऊपर मैं अकेला रहूँगा तब आना। तब उस विषय पर बातचीत होगी।”
शिष्य आनन्द से अधीर होकर बार बार स्वामीजी को प्रणाम करने लगा।
स्वामीजी ‘रहने दे’ ‘रहने दे’ कहने लगे।
थोड़ी देर बाद स्वामीजी ऊपर चले गये।
शिष्य इस बीच नीचे एक साधु के साथ वेदान्त की चर्चा करने लगा और धीरे धीरे द्वैताद्वैत मत के वितण्डवाद से मठ कोलाहलपूर्ण हो गया।
हल्ला सुनकर शिवानन्द महाराज ने उससे कहा,
“अरे धीरे धीरे चर्चा कर, ऐसा चिल्लाने से स्वामीजी के ध्यान में विघ्न होगा।”
उस बात को सुनकर शिष्य शान्त हुआ और चर्चा समाप्त करके ऊपर स्वामीजी के पास चला गया।
शिष्य ने ऊपर पहुँचते ही देखा, स्वामीजी पश्चिम की ओर मुँह करके फर्श पर बैठे हुए ध्यानमग्न हैं। मुख अपूर्व भाव से पूर्ण है, मानो चन्द्रमा की कान्ति फूटकर निकल रही है।
उनके सभी अंग एकदम स्थिर मानो “चित्रार्पितारम्भ इवावातस्थे।”
स्वामीजी की वह ध्यानमग्न मूर्ति देखकर वह विस्मित होकर पास ही खड़ा रहा और बहुत देर तक खड़े रहकर भी स्वामीजी के बाह्य ज्ञान का कोई चिह्न न देखकर चुपचाप उसी स्थान पर बैठ गया। करीब आधा घण्टा बीत जाने पर स्वामीजी के पार्थिव राज्य के सम्बन्ध में ज्ञान का मानो थोड़ा थोड़ा आभास दीखने लगा। शिष्य ने देखा उनका मुठ्ठी-बन्द हाथ काँप रहा है।
उसके पाँच-सात मिनट बाद ही स्वामीजी ने आँखें खोलकर शिष्य से कहा,
“यहाँ पर कब आया?”
शिष्य :
” यही थोड़ी देर से आया हूँ।”
स्वामीजी –
” अच्छा, एक गिलास जल तो ले आ। ”
शिष्य तुरन्त स्वामीजी के लिए रखी हुई खास सुराही से जल ले आया। स्वामीजी ने थोड़ा जल पीकर गिलास जगह पर रखने के लिए शिष्य से कहा। शिष्य ने गिलास रख दिया और स्वामीजी के पास आकर बैठ गया।
स्वामीजी –
आज ध्यान बहुत जमा था।
शिष्य –
महाराज, ध्यान करते समय बैठने पर मन जिससे पूर्ण रूप से डूब जाय, वह मुझे सिखा दीजिये।
स्वामीजी –
तुझे सब उपाय तो पहले ही बता दिये हैं; प्रतिदिन उसी प्रकार ध्यान किया कर। समय पर सब मालूम होगा। अच्छा, बोल तो तुझे क्या अच्छा लगता है?
शिष्य –
महाराज, आपने जैसा कहा था, वैसा करता हूँ, परन्तु फिर भी मेरा अभी तक अच्छी तरह से ध्यान नहीं जमता।
फिर कभी कभी मन में आता है – ध्यान करके क्या होगा? इसलिए ऐसा लगता है कि मेरा ध्यान नहीं जमेगा।
अब हमेशा आपके पास रहना ही मेरी एकमात्र इच्छा है।
स्वामीजी –
वह सब मानसिक दुर्बलता का चिह्न है। सदा नित्य प्रत्यक्ष आत्मा में तन्मय हो जाने की चेष्टा किया कर। आत्मदर्शन एक बार होने पर, सब कुछ हुआ ही समझ, जन्म-मृत्यु का जाल तोड़कर चला जायगा।
शिष्य –
आप कृपा करके वही कर दीजिए। आपने आज एकान्त में आने के लिए कहा था, इसलिए आया हूँ। जिससे मेरा मन स्थिर हो, ऐसा कुछ कर दीजिये।
स्वामीजी –
समय पाते ही ध्यान किया कर। सुषुम्ना के पथ पर मन यदि एक बार चला जाय, तो अपने आप ही सब कुछ ठीक हो जायगा। फिर अधिक कुछ करना न होगा।
शिष्य –
आप तो कितना उत्साह देते हैं! परन्तु मुझे सत्य वस्तु प्रत्यक्ष होगी क्या? यथार्थ ज्ञान प्राप्त करके मुक्त हो सकूँगा क्या?
स्वामीजी –
अवश्य होगा। समय पर कीट से ब्रह्मा तक सभी मुक्त हो जायेंगे – और तू नहीं होगा? उन सब दुर्बलताओं को मन में स्थान न दिया कर।
इसके बाद स्वामीजी बोले,
“श्रद्धावान बन, वीर्यवान बन, आत्मज्ञान प्राप्त कर और परहित के लिए जीवन का उत्सर्ग कर दे यही मेरी इच्छा और आशीर्वाद है।”
इसके बाद प्रसाद की घण्टी बजने पर स्वामीजी ने शिष्य से कहा,
“जा, प्रसाद की घण्टी बज गयी है।”
शिष्य ने स्वामीजी के चरणों में प्रणाम करके कृपा की भिक्षा माँगी।
स्वामीजी ने शिष्य के मस्तक पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया और कहा,
“मेरे आशीर्वाद से तेरा यदि कोई उपकार होता है तो कहता हूँ, ‘भगवान श्रीरामकृष्ण तुझ पर कृपा करें।’ इससे बढ़कर आशीर्वाद और मैं तुझे क्या दूँ।”
शिष्य ने आनन्दित होकर, नीचे उतरकर शिवानन्दजी महाराज से स्वामीजी के आशीर्वाद की बात कही।
स्वामीजी शिवानन्द उस बात को सुनकर बोले,
“जा बांगाल, तेरा सब कुछ बन गया। इसके बाद स्वामीजी के आशीर्वाद का परिणाम जान सकेगा।”
भोजन के बाद शिष्य उस रात्रि को फिर ऊपर न गया, क्योंकि आज स्वामीजी जल्दी सोने के लिए लेट गये थे।
दूसरे दिन प्रातःकाल ही शिष्य को कार्यवश कलकत्ता लौटना था। अतः जल्द हाथ-मुँह धोकर वह ऊपर स्वामीजी के पास पहुँचा।
स्वामीजी – ” अभी जायगा ? ”
शिष्य – जी हाँ।
स्वामीजी – ” अगले रविवार को तो आयगा न ? ”
शिष्य – ” अवश्य महाराज। ”
स्वामीजी
तो जा वह एक नाव आ रही है, उसी पर चला जा। शिष्य ने स्वामीजी के चरणकमलों से इस जन्म के लिए विदा ली। वह उस समय भी नहीं जानता था कि गुरुदेव के साथ स्थूल शरीर में उसका यही अन्तिम साक्षात्कार था।
स्वामीजी प्रसन्न मुख से उसे विदा देकर फिर बोले,
“रविवार को आना!” शिष्य भी “आऊँगा” कहकर नीचे उतर गया।
स्वामी सारदानन्दजी उसे जाते देखकर बोले,
“अरे, वे दो कालर तो लेता जा। नहीं तो मुझे स्वामीजी की बात सुननी पड़ेगी।”
शिष्य बोला,
“आज बहुत जल्दी है और किसी दिन ले जाऊँगा। आप स्वामीजी से कह दीजियेगा।”
नाव का मल्लाह पुकार रहा था।
इसलिए शिष्य उन बातों को कहते कहते नाव की ओर भागा। शिष्य ने नाव पर से ही देखा, स्वामीजी ऊपर के बरामदे में धीरे धीरे टहल रहे हैं। वह उन्हें वहीं से प्रणाम करके; नाव के भीतर जाकर बैठ गया। नाव भाटे के जोर से आध घण्टे में ही अहीरी
टोला के घाट पर आ पहुँची।
इसके सात दिनों बाद ही स्वामीजी ने अपना पांचभौतिक शरीर त्याग दिया। शिष्य को उस घटना से पूर्व कुछ भी मालूम नहीं हुआ। उनकी महासमाधि के दूसरे दिन समाचार पाकर, वह मठ में आया। पर स्थूल शरीर में स्वामीजी का दर्शन फिर उसके भाग्य में नहीं था।
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Portion 02 of 03
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Page 311 to 318 | परिच्छेद ४५ |
स्थान कलकत्ते से मठ में जाते हुए नाव पर वर्ष – १९०२ ईसवी
Portion 02 of
विषय
– स्वामीजी की अहंकारशून्यता काम
– कांचन को बिना छोडे श्रीरामकृष्ण को ठीक ठीक समझना असम्भव है
– श्रीरामकृष्णदेव के अन्तरंग भक्त कौन लोग हैं
-सर्वत्यागी संन्यासी भक्तगण ही सर्वकाल में जगत् में अवतारी महापुरुषों के भावों का प्रचार करते हैं
– गृही भक्तगण श्रीरामकृष्ण के बारे में जो कुछ कहते हैं, वह भी आंशिक रूप से सत्य है
– महान् श्रीरामकृष्ण के भाव की एक बूँद धारण कर सकने पर मनुष्य घन्य हो जाता है
– संन्यासी भक्तों को श्रीरामकृष्ण द्वारा विशेष रूप से उपदेश दान
– समय आने पर समस्त संसार श्रीरामकृष्ण के उदार भाव को ग्रहण करेगा
– श्रीरामकृष्ण की कृपा को प्राप्त करनेवाले साधुओं की सेवा-वन्दना मनुष्य के लिए कल्याणदायी
शिष्य ने आज तीसरे प्रहर कलकत्ते के गंगातट पर टहलते टहलते देखा कि थोड़ी दूरी पर एक संन्यासी अहिरीटोला घाट की ओर अग्रसर हो रहे हैं। वे जैसे पास आये तो देखा वे साधु और कोई नहीं है – उसी के गुरुदेव स्वामी विवेकानन्दजी ही हैं।
स्वामीजी के बाँये हाथ में शाल के पत्ते के दोने में भुना हुआ चनाचूर है, बालक की तरह खाते खाते वे आनन्द से चले आ रहे हैं।
जगत्विख्यात स्वामीजी को उस रूप में रास्ते पर चनाचूर खाते हुए आते देख शिष्य विस्मित होकर उनकी अहंकारशून्यता की बात सोचने लगा। वे जब समीप आये तो शिष्य ने उनके चरणों में प्रणत होकर उनके एकाएक कलकत्ता आने का कारण पूछा।
स्वामीजी – एक काम से आया था। चल तू मठ में चलेगा! थोड़ा भुना हुआ चना खा न! अच्छा नमक-मसालेदार है।
शिष्य ने हँसते हँसते प्रसाद लिया और मठ में जाना स्वीकार किया।
स्वामीजी तो फिर एक नाव देख।
शिष्य भागता हुआ किराये से नाव लेने दौड़ा।
किराये के सम्बन्ध में माझिओं के साथ बातचीत चल रही है, इसी समय स्वामीजी भी वहाँ पर आ पहुँचे। नाववाले ने मठ पर पहुँचा देने के लिए आठ आने माँगे।
शिष्य ने दो आने कहा।
“इन लोगों के साथ क्या किराये के बारे में लड़ रहा है?”
यह कहकर स्वामीजी ने शिष्य को चुप किया और माझी से कहा, “चल, आठ आने ही दूँगा” और नाव पर चढ़े।
भाटे के प्रबल वेग के कारण नाव बहुत धीरे धीरे चलने लगी और मठ तक पहुँचते पहुँचते करीब डेढ़ घण्टा लग गया।
नाव में स्वामीजी को अकेला पाकर शिष्य को निःसंकोच होकर सारी बातें उनसे पूछ लेने का अच्छा अवसर मिल गया।
इसी वर्ष के २० आषाढ़ (बंगला) को स्वामीजी ने देहत्याग किया। उस दिन गंगाजी पर स्वामीजी के साथ शिष्य का जो वार्तालाप हुआ था, वही यहाँ पाठकों को उपहार के रूप में दिया जाता है।
श्रीरामकृष्ण के गत जन्मोत्सव में शिष्य ने उनके भक्तों की महिमा का कीर्तन करके जो स्तव छपवाया था, उसके सम्बन्ध में प्रसंग उठाकर स्वामीजी ने उससे पूछा, “तूने अपने रचित स्तव में जिन जिन का नाम लिया है, कैसे जाना कि वे सभी श्रीरामकृष्ण की लीला के साथी हैं?”
शिष्य – महाराज ! श्रीरामकृष्ण के संन्यासी और गृही भक्तों के पास इतने दिनों से आना-जाना कर रहा हूँ, उन्हींके मुख से सुना है कि वे सभी श्रीरामकृष्ण के भक्त है।
स्वामीजी – श्रीरामकृष्ण के भक्त हो सकते हैं परन्तु सभी भक्त तो उनकी लीला के साथियों में अन्तर्भूत नहीं हैं! उन्होंने काशीपुर के बगीचे में हम लोगों से कहा था, ‘माँ ने दिखा दिया, ये सभी लोग यहाँ के (मेरे) अन्तरंग नहीं हैं।’ स्त्री तथा पुरुष दोनों प्रकार के भक्तों के सम्बन्ध में उन्होंने उस दिन ऐसा कहा था।
उसके बाद वे अपने भक्तों में जिस प्रकार ऊँच नीच श्रेणियों का निर्देश किया करते थे, उसी बात को कहते कहते धीरे धीरे स्वामीजी शिष्य को भलीभाँति समझाने लगे कि गृहस्थ और संन्यासी जीवन में कितना अन्तर है।
स्वामीजी – कामिनी-कांचन का सेवन भी करेगा और श्रीरामकृष्ण को भी समझेगा – ऐसा भी कभी हुआ या हो सकता है? इस बात पर कभी विश्वास न करना। श्रीरामकृष्ण के भक्तों में से अनेक व्यक्ति इस समय अपने को ईश्वर कोटि’ ‘अन्तरंग’ आदि कहकर प्रचार कर रहे हैं।
उनका त्याग-वैराग्य तो कुछ भी न ले सके, परन्तु कहते क्या हैं कि वे सब श्रीरामकृष्ण के अन्तरंग भक्त हैं! उन सब बातों को झाडू मारकर निकाल दिया कर। जो त्यागियों के बादशाह हैं उनकी कृपा प्राप्त करके क्या कोई कभी काम-कांचन के सेवन में जीवन व्यतीत कर सकता है?
शिष्य – तो क्या महाराज, जो लोग दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण के पास उपस्थित हुए थे, उनमें से सभी लोग उनके भक्त नहीं है?
स्वामीजी यह कौन कहता है? सभी लोग उनके पास आनाजाना करके धर्म की अनुभूति की ओर अग्रसर हुए हैं, हो रहे हैं और होंगे। वे सभी उनके भक्त हैं। परन्तु असली बात यह है कि सभी लोक उनके अन्तरंग नहीं हैं।
श्रीरामकृष्ण कहा करते थे, ‘
अवतार के साथ दूसरे कल्प के सिद्ध ऋषिगण देह धारण करके जगत् में पधारते हैं। वे ही भगवान के साक्षात् पार्षद हैं। उन्हीं के द्वारा भगवान कार्य करते हैं या जगत् में धर्मभाव का प्रचार करते हैं।’ यह जान ले अवतार के संगी-साथी एकमात्र वे लोग हैं जो दूसरों के लिए सर्वत्यागी हैं जो भोगसुख को काक-विष्ठा की तरह छोड़कर ‘जगद्धिताय’ ‘जीवहिताय’ आत्मोत्सर्ग करते हैं।
भगवान ईसा मसीह के सभी शिष्यगण संन्यासी हैं। शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, श्रीचैतन्य महाप्रभु व बुद्धदेव की साक्षात् कृपा को प्राप्त करनेवाले सभी साथी सर्वत्यागी संन्यासी हैं। ये सर्वत्यागी ही गुरुपरम्परा के अनुसार जगत् में ब्रह्मविद्या का प्रचार करने आये हैं। किसने कब सुना है काम-कांचन के दास बने रहकर भी कोई मनुष्य जनता का उद्धार करने या ईश्वरप्राप्ति का उपाय बताने में समर्थ. हुआ है? स्वयं मुक्त न होने पर दूसरों को कैसे मुक्त किया जा सकता है? बैद, वेदान्त, इतिहास, पुराण सर्वत्र देख सकेगा संन्यासीगण ही सर्व काल में सभी देशों में लोकगुरु के रूप में र्धम का उपदेश देते रहे हैं। यही इतिहास भी बतलाता है। History repeats itself – यथा पूर्व तथा परम् अब भी वही होगा।
महा समन्वयाचार्य श्रीरामकृष्ण की संन्यासी सन्तान ही लोकगुरु के रूप में जगत् में सर्वत्र पूजित हो रही है और होगी। त्यागी के अतिरिक्त दूसरों की बात सूनी आवाज की तरह शून्य में विलीन हो जायगी। मठ के यथार्थ त्यागी संन्यासीगण ही धर्मभाव की रक्षा और प्रचार के महा केन्द्रस्वरूप बनेंगे, समझा ?
शिष्य
– तो फिर श्रीरामकृष्ण के गृहस्थ भक्तगण जो उनकी बातों का भिन्न भिन्न प्रकार से प्रचार कर रहे हैं, क्या वह सत्य नहीं है?
स्वामीजी – एकदम झूठा नहीं कहा जा सकता; परन्तु वे श्रीरामकृष्ण के सम्बन्ध में जो कुछ कहते हैं, वह सब आंशिक सत्य है; जिसमें जितनी क्षमता है वह श्रीरामकृष्ण का उतना अंश ही लेकर चर्चा कर रहा है। वैसा करना बुरा नहीं है। परन्तु उनके भक्तों में यदि ऐसा किसी ने समझा हो कि वह जो समझा है अथवा कह रहा है, वही एकमात्र सत्य है, तो वह बेचारा दया का पात्र है।
श्रीरामकृष्ण को कोई कह रहे हैं – तान्त्रिक कौल; कोई कहते हैं – चैतन्यदेव नारदीय भक्ति का प्रचार करने के लिए पैदा हुए थे; कोई कहते हैं – श्रीरामकृष्ण की साधना उनके अवतारत्व में विश्वास की विरोधी है; कोई कहते हैं- संन्यासी बनना श्रीरामकृष्ण की राय में ठीक नहीं हैं, इत्यादि। इसी प्रकार की कितनी ही बातें गृही भक्त के मुख से सुनेगा उन सब बातों पर ध्यान न देगा। श्रीरामकृष्ण क्या हैं, वे कितने ही पूर्व अवतारों के जमे हुए भावराज्य के अधिराज हैं- इस बात को प्राणपण से तपस्या करके भी मैं रत्ती भर नहीं समझ सका। इसलिए उनके सम्बन्ध में संयत होकर ही बात करना उचित है। जो जैसा पात्र है, उसे वे उतना ही देकर पूर्ण कर गये हैं। उनके भाव-समुद्र की एक बूँद को भी यदि धारण कर सके तो मनुष्य देवता बन सकता है। सर्व भावों का इस प्रकार समन्वय जगत् के इतिहास में क्या और कहीं भी ढूँढ़ने पर मिल सकता है? इसीसे समझ ले, उनके रूप में कौन देह धारण कर आये थे। अवतार कहने से तो उन्हें छोटा कर दिया जाता है। जब वे अपने संन्यासी सन्तानों को उपदेश दिया करते थे, तब बहुधा वे स्वयं उठकर चारों ओर खोज करके देख लेते थे कि वहाँ पर कोई गृहस्थ तो नहीं है। और जब देख लेते कि कोई नहीं है, तभी ज्वलन्त भाषा में त्याग और तपस्या की महिमा का वर्णन करते थे। उसी संसार-वैराग्य की प्रचण्ड उद्दीपना से ही तो हम संसारत्यागी उदासीन हैं।
शिष्य – महाराज, वे गृहस्थ और संन्यासियों के बीच इतना अन्तर रखते थे?
स्वामीजी – यह उनके गृही भक्तों से पूछकर देख। यही क्यों नहीं समझ लेता कि उनकी जो सब सन्तान ईश्वर-प्राप्ति के लिए ऐहिक जीवन के सभी भोगों का त्याग करके पहाड़, पर्वत, तीर्थ तथा आश्रम आदि में तपस्या करते हुए देह का क्षय कर रही है वह बड़ी है अथवा वे लोग जो उनकी सेवा, वन्दना, स्मरण, मनन कर रहे हैं और साथ ही संसार के मायामोह में ग्रस्त हैं?’
जो लोग आत्मज्ञान में, जीवसेवा में जीवन देने को अग्रसर हैं, जो बचपन से ऊध्वरेता हैं, जो त्याग वैराग्य के मूर्तिमान चल विग्रह हैं वे बड़े हैं अथवा वे लोग, जो मक्खी की तरह एकबार फूल पर बैठते हैं पर दूसरे ही क्षण विष्ठा पर बैठ जाते हैं? यह सब स्वयं ही समझकर देख।
शिष्य – परन्तु महाराज, जिन्होंने उनकी (श्रीरामकृष्ण की) कृपा प्राप्त कर ली है, उनकी फिर गृहस्थी कैसी? वे घर पर रहें या संन्यास ले ले दोनों ही बराबर हैं, मुझे तो ऐसा ही लगता है।
स्वामीजी – जिन्हें उनकी कृपा प्राप्त हुई है, उनकी मन-बुद्धि फिर किसी भी तरह संसार में आसक्त नहीं हो सकती। कृपा की परीक्षा तो है -काम-कांचन में अनासक्ति। वही यदि किसी की न हुई तो उसने श्रीरामकृष्ण की कृपा कभी ठीक ठीक प्राप्त नहीं की।
पूर्व प्रसंग इसी प्रकार समाप्त होने पर शिष्य ने दूसरी बात उठाकर स्वामीजी से पूछा, “महाराज, आपने जो देश विदेश में इतना परिश्रम किया है, उसका क्या परिणाम हुआ?”
स्वामीजी – क्या हुआ? – इसका केवल थोड़ा ही भाग तुम लोग देख सकोगे। समयानुसार समस्त संसार को श्रीरामकृष्ण का उदार भाव ग्रहण करना पड़ेगा। इसकी अभी सूचना मात्र हुई है। इस प्रबल बाढ़ के वेग में सभी को बह जाना पड़ेगा।
शिष्य – आप श्रीरामकृष्ण के बारे में और कुछ कहिये। उनका प्रसंग आपके श्रीमुख से सुनने में अच्छा लगता है।
स्वामीजी – यही तो कितना दिनरात सुन रहा है। उनकी उपमा वे ही हैं। उनकी तुलना है रे?
शिष्य – महाराज, हम तो उन्हें देख नहीं सकते। हमारे उद्धार का क्या उपाय है!
स्वामीजी – उनकी कृपा को साक्षात् प्राप्त करनेवाले जब इन सब साधुओं का सत्संग कर रहा है, तो फिर उन्हें क्यों नहीं देखा, बोल? वे अपनी त्यागी सन्तानों में विराजमान हैं। उनकी सेवा-वन्दना करने पर, वे कभी न कभी अवश्य प्रकट होंगे। समय आने पर सब देख सकेगा।
शिष्य – अच्छा महाराज, आप श्रीरामकृष्ण की कृपा प्राप्त किये हुए दूसरे सभी की बात कहते हैं। परन्तु आपके सम्बन्ध में वे जो कुछ कहा करते थे, वह बात तो आप कभी भी नहीं कहते ?
स्वामीजी – अपनी बात और क्या कहूँगा? देख तो रहा है – मैं उनके दैत्य दानवों में से कोई एक होऊंगा। उनके सामने ही कभी कभी उन्हें भला-बुरा कह देता था। वे सुनकर हँस देते थे।
यह कहते कहते स्वामीजी का मुखमण्डल गम्भीर हो गया, गंगाजी की ओर शून्य मन से देखते हुए कुछ देर तक स्थिर होकर बैठे रहे। धीरे धीरे शाम हो गयी। नाव भी धीरे धीरे मठ में आ पहुँची। स्वामीजी उस समय एकाग्रचित्त हो गाना गा रहे थे- “(केवल) आशार आशा भवे आसा, आसा मात्र सार हल। एखन सन्ध्यावेलाय घरेर छेले घरे निये चल।”
भावार्थ – केवल आशा की आशा में दुनिया में आना हुआ, (और) आना भर ही सार हुआ है। अब साँझ के समय (मुझे) घर के लड़के को घर ले चलो।
गाना सुनकर शिष्य स्तम्भित होकर स्वामीजी के मुख की ओर देखता रह गया।
गाना समाप्त होने पर स्वामीजी बोले,
“तुम्हारे पूर्व बंगाल प्रदेश में सुकण्ठ गायक पैदा नहीं होते। माँ गंगा का जल पेट में गये बिना सुकण्ठ गायक नहीं होता है।”
किराया चुकाकर स्वामीजी नाव से उतरे और कुरता उतारकर मठ के पश्चिमी बरामदे में बैठ गये। स्वामीजी के गौर वर्ण और गेरुए वस्त्र ने सायंकाल के दीपों के आलोक में अपूर्व शोभा को धारण किया।
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परिच्छेद ४४ | स्थान – बेलुड़ मठ | वर्ष – १९०२ ईसवी
विषय – मठ में कठिन विधि-नियमों का प्रचलन डिबिया” व उसकी शक्ति की परीक्षा
– “आत्माराम ” की स्वामीजी के महत्त्व के सम्बन्ध में शिष्य का स्वामी प्रेमानन्द के साथ वार्तालाप
– पूर्व बंग में अद्वैतावाद का प्रचार करने के लिए स्वामीजी का शिष्य को प्रोत्साहित करना और विवाहित होते हुए भी धर्मलाभ का अभयदान
– श्रीरामकृष्णदेव के संन्यासी शिष्यों के बारे में स्वामीजी का विश्वास नाग महाशय का सिद्धसंकल्पत्व।
स्वामीजी अभी मठ में ही ठहरे हैं।
शास्त्रचर्चा के लिए मठ में प्रतिदिन प्रश्नोत्तर-क्लास चल रहा है। इस क्लास में स्वामी शुद्धानन्द, विरजानन्द व स्वरूपानन्द प्रधान जिज्ञासु हैं। इस प्रकार शास्त्रालोचना का निर्देश स्वामीजी “चर्चा” शब्द द्वारा किया करते थे और संन्यासियों तथा ब्रह्मचारियों को सदैव यह “चर्चा” करने के लिए उत्साहित करते थे।
किसी दिन गीता, किसी दिन भागवत, तो किसी दिन उपनिषद् या ब्रह्मसूत्र-भाष्य की चर्चा हो रही है। स्वामीजी भी प्रायः प्रतिदिन वहाँ पर उपस्थित रहकर प्रश्नों की मीमांसा कर रहे हैं।
स्वामीजी के आदेश पर एक ओर जैसी कठोर नियम के साथ ध्यान-धारणा चल रही है दूसरी ओर उसी प्रकार शास्त्रचर्चा के लिए प्रतिदिन उक्त क्लास चल रहा है। उनकी आज्ञा को मानते हुए सभी उनके चलाये हुए नियमों का अनुसरण करके चल रहे हैं।
मठनिवासियों के भोजन, शयन, पाठ, ध्यान आदि सभी इस समय कटोर नियम द्वारा बद्ध हैं। कभी किसी दिन उस नियम का यदि कोई जरा भी उल्लंघन करता था, तो नियम की मर्यादा को तोड़ने के कारण उस दिन के लिए उसे मठ में भोजन नहीं दिया जाता।
उस दिन उसे गाँव से भिक्षा माँगकर लानी पड़ती थी और भिक्षा में प्राप्त अन्न को मठभूमि में स्वयं ही पकाकर खाना पड़ता था। फिर संघ-निर्माण के लिए स्वामीजी की दूरदृष्टि केवल मठ-निवासियों के लिए दैनिक नियम बनाकर ही नहीं रुक गयी, बल्कि भविष्य में मठ में जो रीति-नीति तथा कार्यप्रणाली जारी रहेगी उसकी भलीभाँति आलोचना करके उसके सम्बन्ध में विस्तार के साथ अनुशासनसमूहों को भी तैयार किया गया है। उसकी पाण्डुलिपि आज भी बेलुड़ मठ में यत्नपूर्वक रखी गयी है। के बो प्रतिदिन स्नान के बाद स्वामीजी मन्दिर में जाते हैं, श्रीरामकृष्ण का चरणामृत पान करते हैं, उनके श्रीपादुकाओं को मस्तक से स्पर्श करते हैं और श्रीरामकृष्ण की भस्मास्थिपूर्ण डिबिया के सामने साष्टांग प्रणाम करते है।
इस डिबिया को वे बहुधा “आत्माराम की डिबिया” कहा करते थे। इसके कुछ दिन पूर्व उस “आत्माराम की डिबिया” को लेकर एक विशेष घटना घटी। एक दिन स्वामीजी उसे मस्तक द्वारा स्पर्श करके ठाकुर-घर से बाहर आ रहे थे इसी समय एकाएक उनके मन में आया, वास्तव में क्या इसमें आत्माराम श्रीरामकृष्ण का वास है?
परीक्षा करके देखूँगा, ऐसा सोचकर मन ही मन उन्होंने प्रार्थना की,
“हे प्रभो, यदि तुम राजधानी में उपस्थित अमुक महाराजा को आज से तीन दिन के भीतर आकर्षित करके मठ में ला सको तो समझेंगा कि तुम वास्तव में यहाँ पर हो।”
मन ही मन ऐसा कहकर वे ठाकुर-घर से बाहर निकल आये और उस विषय में किसी से कुछ भी न कहा। थोड़ी देर बाद वे उस बात को बिलकुल भूल गये। दूसरे दिन वे किसी काम से थोड़े समय के लिए कलकत्ता गये। तीसरे प्रहर मठ में लौटकर उन्होंने सुना कि सचमुच ही उस महाराजा ने मठ के निकटवर्ती ग्रैण्ड ट्रंक रोड पर से जाते जाते रास्ते में गाड़ी रोककर स्वामीजी की तलाश में मठ में आदमी भेजा था और यह जानकर कि वे मठ में उपस्थित नहीं है, मठदर्शन के लिए नहीं आये।
यह समाचार सुनते ही स्वामीजी को अपने संकल्प की याद आ गयी और बड़े विस्मय से अपने गुरुभाइयों के पास विवेकानन्दजी के संग में उस घटना का वर्णन कर उन्होंने “आत्माराम की डिबिया” की विशेष यत्न के साथ पूजा करने का उन्हें आदेश दिया।
आज शनिवार है। शिष्य तीसरे प्रहर मठ में आते ही इस घटना के बारे में जान गया है।
स्वामीजी को प्रणाम करके बैठते ही उसे ज्ञात हुआ कि वे उसी समय घूमने निकलेंगे।
स्वामी प्रेमानन्द को साथ चलने के लिए तैयार होने को कहा है। शिष्य की बहुत इच्छा है कि वह स्वामीजी के साथ जाय, परन्तु स्वामीजी की अनुमति पाये बिना जाना उचित नहीं है यह सोचकर वह बैठा रहा। स्वामीजी अलखल्ला तथा गेरुआ कनटोप पहनकर एक मोटा डण्डा हाथ में लेकर बाहर निकले। पीछे पीछे स्वामी प्रेमानन्द चले।
(स्वामी प्रेमानन्द) जाने के पहले शिष्य की ओर ताककर बोले, “चल, चलेगा?”
शिष्य कृतकृत्य होकर स्वामी प्रेमानन्द के पीछे पीछे चल दिया।
न जाने क्या सोचते सोचते स्वामीजी कुछ अनमने से होकर चलने लगे। धीरे धीरे ग्रैण्ड ट्रंक रोड पर आ पहुँचे।
शिष्य ने स्वामीजी का उक्त प्रकार का भाव देखकर कुछ बातचीत आरम्भ करके उनकी चिन्ता को भंग करने का साहस किया; पर उसमें सफलता न पाकर वह प्रेमानन्द महाराज के साथ अनेक प्रकार से वार्तालाप करते करते उनसे पूछने लगा,
“महाराज, स्वामीजी के महत्त्व के बारे में श्रीरामकृष्ण आप लोगों से क्या कहा करते थे, कृपया बतलाइये।” उस समय स्वामीजी थोड़ा आगे आगे चल रहे थे।
स्वामी प्रेमानन्द – बहुत कुछ कहा करते थे; तुझे एक दिन में क्या बताऊँ? कभी कहा करते थे, ‘नरेन अखण्ड के घर से आया है।’ कभी कहा करते थे, ‘नरेन मेरी ससुराल है।’ फिर कभी कहा करते थे, ‘ऐसा व्यक्ति जगत् में न कभी आया है और न आयगा।’ एक दिन बोले थे, ‘महामाया उनके पास जाते डरती है।’ वास्तव में वे उस समय किसी देवी-देवता के सामने सिर न झुकाते थे। श्रीरामकृष्ण ने एक दिन श्रीजगन्नाथदेव का प्रसाद सन्देश (एक प्रकार की मिठाई) के भीतर भरकर उन्हें खिला दिया था। बाद में श्रीरामकृष्ण की कृपा से सब देख सुनकर धीरे धीरे उन्होंने सब माना। शिष्य – मेरे साथ रोज कितनी हंसी करते हैं, परन्तु इस समय ऐसे गम्भीर बने हैं कि बात करने में भी भय हो रहा है।
स्वामी प्रेमानन्द – असली बात तो यह है कि महापुरुषगण कब किस भाव में रहते हैं यह समझना हमारी मन-बुद्धि के परे है। श्रीरामकृष्ण के जीवित काल में देखा है, नरेन् को दूर से देखकर वे समाधिमग्न हो जाते थे। जिन लोगों की छुई हुई चीजों को खाने से वे दूसरों को मना करते थे उनकी छुई चीजें अगर नरेन खा लेता तो कुछ न कहते थे। कभी कहा करते, ‘माँ उसके अद्वैत ज्ञान को दबाकर रख, मेरा बहुत काम है।’
इन सब बातों को अब कौन समझेगा और किससे कहूँ?
शिष्य – महाराज, वास्तव में कभी कभी ऐसा मालूम होता है कि वे मनुष्य नहीं है, परन्तु फिर बातचीत, युक्ति-विचार करते समय मनुष्य जैसे लगते हैं। ऐसा प्रतीत होता है, मानो किसी आवरण द्वारा उस समय वे अपने स्वरूप को समझने नहीं देते।
स्वामी प्रेमानन्द – श्रीरामकृष्ण कहा करते थे, ‘वह (नरेन) जब जान जायगा कि वह स्वयं कौन है, तो फिर इस शरीर में नहीं रहेगा, चला जायगा।’ इसीलिए कामकाज में नरेन का मन लगा रहने पर हम निश्चिन्त रहते हैं। उसे अधिक ध्यान-धारणा करते देखकर हमें भय लगता है।
अब स्वामीजी मठ की ओर लौटने लगे। उस समय स्वामी प्रेमानन्द और शिष्य को पास पास देखकर उन्होंने पूछा, “क्यों रे, तुम दोनों की आपस में क्या बातचीत हो रही थी?”
शिष्य ने कहा,
“यही सब श्रीरामकृष्ण के सम्बन्ध में नाना प्रकार की बातें हो रही थीं।” उत्तर सुनकर स्वामीजी फिर अनमने होकर चलते चलते मठ में लौट आये और मठ के आम के पेड़ के नीचे जो कैम्प खटिया उठने बैठने के लिए बिछी हुई थी, उस पर आकर बैठ गये। थोड़ी देर विश्राम करने के बाद हाथ-मुँह धोकर वे ऊपर के बरामदे में गये और टहलते टहलते शिष्य से कहने लगे, “तू अपने प्रदेश में वेदान्त का प्रचार क्यों नहीं करने लग जाता? वहाँ पर तान्त्रिक मत का बड़ा जोर है। अद्वैतवाद के सिंहनाद से पूर्व बंगाल प्रदेश को हिला दे तो देखूँ। तब जानूँगा कि तू वेदान्तवादी है। उस प्रदेश में पहलेपहल एक वेदान्त की संस्कृत पाठशाला खोल दे उसमें उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र आदि सब पढ़ा। लड़कों को ब्रह्मचर्य की शिक्षा दे और शास्त्रार्थ करके तान्त्रिक पण्डितों को हरा दे! सुना है, तुम्हारे प्रदेश में लोग केवल न्यायशास्त्र की किटिरमिटिर पढ़ते हैं। उसमें है क्या? व्याप्तिज्ञान और अनुमान – इसी पर तो नैयायिक पण्डितों का महीनों तक शास्त्रार्थ चलता है! उससे आत्मज्ञान-प्राप्ति में क्या कोई विशेष सहायता मिलती है, बोल! वेदान्त द्वारा प्रतिपादित ब्रह्मतत्त्व का पठनपाठन हुए बिना क्या देश के उद्धार का और कोई उपाय है रे? तू अपने ही देश में या नाग महाशय के मकान पर ही सही एक चतुष्पाठी (पाठशाला) खोल दे। उसमें इन सब सत्रशास्त्रों का पठनपाठन होगा और श्रीरामकृष्ण के जीवन-चरित्र की चर्चा होगी। ऐसा करने पर तेरे अपने कल्याण के साथ ही साथ कितने दूसरे लोगों का भी कल्याण होगा। तेरी कीर्ति भी होगी।”
शिष्य – महाराज, मैं नाम यश की आकांक्षा नहीं रखता। फिर भी आप जैसा कह रहे हैं, कभी कभी मेरी भी ऐसी इच्छा अवश्य होती है। परन्तु विवाह करके घर-गृहस्थी में ऐसा जकड़ गया हूँ कि कहीं मन की बात मन ही में न रह जाय।
स्वामीजी – विवाह किया है तो क्या हुआ?
माँ-बाप, भाई-बहिन को अन्नवस्त्र देकर जैसे पाल रहा है, वैसे ही स्त्री का पालन कर, बस।
धर्मोपदेश देकर उसे भी अपने पथ में खींच ले। महामाया की विभूति मानकर सम्मान की दृष्टि से देखा कर। धर्म के पालन में ‘सहधर्मिणी’ माना कर और दूसरे समय जैसे अन्य दस व्यक्ति देखते हैं, वैसे ही तू भी देखा कर। इस प्रकार सोचते सोचते देखेगा कि मन की चंचलता एकदम मिट जायगी। भय क्या है?
स्वामीजी की अभयवाणी सुनकर शिष्य को कुछ विश्वास हुआ। भोजन के बाद स्वामीजी अपने बिस्तर पर जा बैठे। अन्य सब लोगों का अभी प्रसाद पाने का समय नहीं हुआ; इसलिए शिष्य को स्वामीजी की चरणसेवा करने का अवसर मिल गया।
स्वामीजी भी उसे मठ के सब निवासियों के प्रति श्रद्धावान बनने का आदेश देने के सिलसिले में कहने लगे, “ये जो सब श्रीरामकृष्ण की सन्तानों को देख रहा है वे सब अद्भुत त्यागी हैं, इनकी सेवा करके लोगों की चित्तशुद्धि होगी – आत्मत्तत्त्व प्रत्यक्ष होगा।
‘परिप्रश्नेन सेवया’- गीता का कथन सुना है न? इनकी सेवा किया कर। तभी सब कुछ हो जायगा। तुझ पर इनका कितना प्रेम है, जानता है?”
शिष्य – परन्तु महाराज, इन लोगों को समझना बहुत ही कठिन मालूम होता है। एक एक व्यक्ति का एक एक भाव।
एक होगा। पर तेरे
स्वामीजी – श्रीरामकृष्ण कुशल बागवान थे न! इसीलिए तरह तरह फर में मन को
हन को नॉपदेश सम्मान या है।
भोजन प्रसाद – करने के फूलों से संघरूपी गुलदस्ते तैयार कर गये हैं।
जहाँ का जो कुछ अच्छा है, सब इसमें आ गया है समय पर और भी कितने आयेंगे। श्रीरामकृष्ण कहा करते थे, ‘जिसने एक दिन के लिए भी निष्कपट चित्त से ईश्वर को पुकारा है, उसे यहाँ पर आना पड़ेगा।’ जो लोग यहाँ पर हैं, वे एक एक महान् सिंह हैं। ये मेरे पास दबकर रहते हैं, इसीलिए कहीं इन्हें मामूली आदमी न समझ लेना। ये ही लोग जब निकलेंगे तो इन्हें देखकर लोगों को चैतन्य प्राप्त होगा। इन्हें अनन्त भावमय श्रीरामकृष्ण के शरीर का अंश जानना। मैं इन्हें उसी भाव से देखता हूँ। वह जो राखाल है, उसके सदृश धर्मभाव मेरा भी नहीं है। श्रीरामकृष्ण उसे मानस-पुत्र मानकर गोदी में लेते थे, खिलाते थे – एक साथ सोते थे। वह हमारे मठ की शोभा है – हमारा बादशाह है। बाबूराम, हरि, सारदा, गंगाधर, शरत्, शशी, सुबोध आदि की तरह ईश्वर-पद-विश्वासी लोग पृथ्वी भर में ढूँढ़ने पर भी शायद न पा सकेगा। इनमें से प्रत्येक व्यक्ति धर्म-शक्ति का मानो एक एक केन्द्र है। समय आने पर उन सब की शक्ति का विकास होगा।
शिष्य विस्मित होकर सुनने लगा;
स्वामीजी ने फिर कहा,
“परन्तु तुम्हारे प्रदेश से नाग महाशय के अतिरिक्त और कोई न आया। और दो एक जनों ने श्रीरामकृष्ण को देखा था, पर वे उन्हें समझ न सके।” नाग महाशय की बात याद करके स्वामीजी थोड़ी देर के लिए स्थिर रह गये। स्वामीजी ने सुना था, एक समय नाग महाशय के घर में गंगाजी का फव्वारा निकल पड़ा था।
उस बात का स्मरण कर वे शिष्य से बोले, “अरे, वह घटना क्या थी, बोल तो?”
शिष्य – महाराज, मैंने भी उस घटना के बारे में सुना है – पर आंखों नहीं देखी।
सुना है, एक बार महावारुणी योग में अपने पिताजी को साथ लेकर नाग महाशय कलकत्ता आने के लिये तैयार हुए, परन्तु भीड़ में गाडी न पाकर तीन चार दिन नारायणगंज में ही रहकर घर लौट आये।
लाचार हो नाग महाशय ने कलकत्ता जाने का इरादा छोड़ दिया और अपने पिताजी से कहा, ‘यदि मन शुद्ध हो तो माँ गंगा यहीं पर आ जायेंगी। इसके बाद महावारुणी योग के समय पर मकान के आँगन की जमीन फोड़कर एक जल का फव्वारा फूट निकला था ऐसा सुना है। जिन्होंने देखा था, उनमें से अनेक व्यक्ति अभी तक जीवित हैं। मुझे उनका संग प्राप्त होने के बहुत दिन पहले यह घटना हुई थी।
स्वामीजी – इसमें फिर आश्चर्य की क्या बात है? वे सिद्धसंकल्प महापुरुष थे; उनके लिए वैसा होने में मैं कुछ भी आश्चर्य नहीं मानता।
यह कहते कहते स्वामीजी ने करवट बदल ली और उन्हें नींद आने लगी।
यह देखकर शिष्य प्रसाद पाने के लिए उठकर चला गया।
वितण्डवाद
वितण्डवाद का अर्थ है व्यर्थ का वाद-विवाद, बेकार की बहस, या तर्क-वितर्क करना। यह एक ऐसा व्यवहार है जिसमें लोग किसी विषय पर बिना किसी ठोस कारण या उद्देश्य के बहस करते रहते हैं, सिर्फ अपने तर्क को सही साबित करने के लिए। [1, 2]
उदाहरण के लिए, यदि दो लोग किसी धार्मिक या philosophical विषय पर बहस कर रहे हैं और दोनों ही एक दूसरे को गलत साबित करने के लिए तर्क दे रहे हैं, तो यह एक तरह का वितण्डवाद हो सकता है। [1, 3]
यह शब्द अक्सर उन स्थितियों का वर्णन करने के लिए उपयोग किया जाता है जहाँ लोग किसी मुद्दे पर चर्चा करने के बजाय सिर्फ अपनी बात को जबरदस्ती मनवाने की कोशिश करते हैं। [1, 3]
वितण्डवाद में तर्क के बजाय व्यक्ति अपने अहंकार और विचारों को सही साबित करने की कोशिश करते हैं, जिससे बहस और भी बढ़ जाती है और अक्सर कोई समाधान नहीं निकलता। [1, 3]
Generative AI is experimental.
[1] https://www.facebook.com/permalink.php/?story_fbid=2197673126988989&id=542852959137689
[2] https://oldror.lbp.world/UploadedData/6580.pdf
[3] https://www.awgp.org/en/literature/book/gayatree_upasana_anivary_hai_aavashyak_hai/v1
चित्रार्पितारम्भ इवावतस्थे” का अर्थ है “जैसे कि एक अधूरा चित्र“। यह एक संस्कृत सूक्ति है जिसका अर्थ है कि चरित्रहीन धनवान व्यक्ति भी दुर्दशा को प्राप्त होता है। इसका मतलब है कि बिना चरित्र के धन का कोई अर्थ नहीं होता है, और वह व्यक्ति अंततः बर्बाद हो जाता है, ठीक जैसे कि एक अधूरा चित्र जो पूरा नहीं हो पाता है।